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हृदय के रक्षक- कमल-गुलाब-जूही के फूल

डॉ आर.अचल पुलस्तेय

आज तेजी से बदलती जीवन शैली में हृदय रोग आम रोगों की श्रेणी में आ गया है। जाड़े के मौसम में हार्ट अटैक के मामले अधिक देखने को मिलते हैं। ठंड में नसें ज्यादा सिकुड़ती हैं और सख्त बन जाती हैं। नसों को गर्म और सक्रिय रखने के लिए खून का बहाव तेज होता है, इससे रक्तचाप भी बढ़ जाता है। रक्तचाप बढऩे पर यदि दिल की धमनियों में कहीं भी रुकावट होती है तो हार्ट अटैक की आशंका बढ़ जाती है। एक रिपोर्ट के अनुसार विकसित देशों के साथ ही विकासशील देशो में भी हृदय रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है।

आधुनिक अध्ययनों के अनुसार बढ़ते मानसिक श्रम, तनाव, प्रदूषण, धूम्रपान असंतुलित आहार-बिहार आदि भी इस रोग के कारण है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में इसके चिकित्सा प्रबंधन, औषधियों एवं शल्यकर्म का भी विकास हुआ है। निदान, परीक्षण के लिए भी अनेकानेक यंत्रों को विकसित किया गया है। परन्तु यह चिकित्सा प्रबंध खर्चीला होने के कारण आम आदमी के पहुँच से दूर है। जबकि हृदय रोग की चिकित्सा के सूत्र आयुर्वेद में प्राचीन काल से ही मिलते है। जिनके अनुपालन व प्रयोग से हृदय को स्वस्थ सुरक्षित रखने के साथ ही हृदय रोगो की चिकित्सा प्रबंधन व बचाव व भी संभव है। इसी क्रम में यहाँ हृदय को बल देने वाले, स्वस्थ रखने के लिए सभी जगह मिलने वाले फूलों, उल्लेख किया जा रहा है। जिनका प्रयोग हृदय रोगियों के लिए लाभदायक होगा।

कमलपुष्प-

यह भारत का राष्ट्रीय पुष्प् धार्मिक रूप से विशेष महत्व रखने के कारण पहचान के लिए मुहताज नहीं हैं। इसका वानस्पतिक नाम “नेलम्बियम स्पेसिओसम” हैं यह भारत के प्रत्येक भाग में उपलब्ध हैं, यह जड़ी-बूटी की दुकानों पर सूखे रूप में भी मिल जाता है। यह लाल, नील, श्वेत, स्वर्ण रंगों में अलग-अलग प्रजातियों के रूप में पाया जाता है, औषधि गुण लाल एवं नील कमल में ही विशेष रूप से पाया जाता हैं इसका मूल पत्र, पुष्प, नाल, केशर सभी अंग औषधि के रूप में प्रयुक्त होते है। हृदय को बल देने के लिए इसकी पंखुरियों का प्रयोग किया जाता है। 10 से 20 ग्राम फूलो का 4 कप पानी में उबालना चाहिए,एक कप पानी बचने पर छान कर दिन में एक से दो बार पीना चाहिए। इससे हृदय की धड़कन नियंत्रित होकर हृदय को बल मिलता है। इससे जलन कम होती है,खून बढ़ता है हृदय को बल मिलता है। ज्वर, मूत्र की रुकावट, अतिसार में भी इससे लाभ होता है, गर्भावस्था के रक्त स्राव होने पर इसके केशर के प्रयोग से शिघ्र लाभ होता है इसमें रासायनिक तत्वों के रूप के रूप में न्यूसिफेरिन, रोमेरिन, र्क्वेसेटिंन, ल्यूटियोंलीन, ग्लूकोसाइडस, केम्फेराल ग्लूकोसाइड्स पाया जाता है।

गुलाबपुष्प –

यह दुनिया में प्रसिद्ध सर्वसुलभ फूल है। इनकी अनेक प्रजातियॉ पायी जाती है। इसे आयुर्वेद में शतपत्री तथा वनस्पति विज्ञान में रोजा सेंटीफोलिया एवं रोजा डमसेना कहते है। इसका रंग लाल एवं गुलाबी होता है। इसी प्रजाति के गुलाब के फूलों का औषधीय प्रयोग किया जाता है। औषधि के रूप में पत्तियों एवं फूलों का प्रयोग किया जाता है। औषधीय प्रयोग के लिए बसंत काल के फूलों को छाया में सुखा कर रखा जाता है। हृदय रोग में फूल का चूर्ण 3 ग्रा0 की मात्रा में मिश्री एवं गाय के दूध से दिन में एक-दो बार दिया जाता है। इससे हृदय को बल मिलता है, नाड़ी की गति एवं धड़कन नियमित होती है। हृदय शूल में सफेद चंदन, कस्तूरी के साथ इसका अर्क दिया जाता है, इससे तत्काल लाभ मिलता है।

इसके अरिरिक्त मुखरोग, त्वकरोग, शिरशूल, कर्णशूल, मूत्र रोग में भी इसका प्रयोग लाभदायक होता है। इलाइची एवं धनियां के साथ अम्लपित्त खट्टी डकार पेट मे जलन में भी लाभ होता है। गुलाब के रासायनिक विश्लेषण में क्यूर्सेटिन, किम्फेराल, साइनीडीन, लाइकोपेन रूबिक्सिंटिन, जिक्सांथिन आदि के अतिरिक्त उड़नशील तैल, सिट्रोनेलोल नेराल, जेरानियाल, बिटाफिनाइल इथनाल आदि यौगिक पाये जाते है।

जूहीपुष्प –

जूही का फूल भी सामान्यतः बागीचो में लगाया जाता है। इससे गजरा बनाया जाता है। आकार में छोटा परन्तु मधुर,प्रियकर व सुगधित होता है। इसके फूल सफेद गुच्छों के रूप लगते है। इसका पौधा झाड़ी एवं लता दोनों के मिलते-जुलते स्वरूप में होता है।

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आयुर्वेद में इसका फूल शीतल, तिक्तमधुर, कषाय, लधु, हृहय के लिए हितकर, पित्तनाशक, कफवात जनक, व्रण रक्तदोष, मुख, दांत, शिर रोग, विष विकार नाशक कहा गया है। हृदय को बल देने के लिए इसका पुष्प चूर्ण 2 से 3 ग्राम की मात्रा में मिश्री या शहद के साथ दिया जाता है। इससे अनियमित धडकन, शूल रक्त चाप में लाभ होता है। रासायनिक रूप से इसमें हेट्रीयाकोंटेन, ट्रीकान्टेनोल, ट्राईटरपेनोयड, जास्मीनोल, मैन्नीटल आदि यौगिक पाये जाते हैं।

(*लेखक-ईस्टर्न साइंटिस्ट शोध पत्रिका के सम्पादक, आयुर्वेद चिकित्सक, वर्ल्ड आयुर्वेद कांग्रेस के संयोजक सदस्य, लेखक एवं विचारक है।)

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