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शौचालयों के मामले में देश ही नहीं, पूरी दुनिया में पुरुषों से कमतर हैं महिलाएं, पर क्यों?

महिलाओं के प्रति यह समाज क्रूरता दिखाता है, खासकर उनके वर्कप्लेस में और सार्वजनिक स्थलों पर, मानो जैसे महिलाओं पर वे इस बात का जोर डाल रहे हों कि वे घर पर ही रहें. पॉटी पैरिटी यानि महिलाओं के लिये शौचालय पर बात करने वाले बेहद कम हैं या फिर कहें कि लोग इस मुद्दे पर बोलने से झिझकते हैं. जबकि महिलाओं के ​साथ इस मुद्दे पर जिस तरह का भेदभाव किया जाता है, उसे दूर करने की जरूरत है, उस पर हर स्तर से बेहतर काम करने की जरूरत है.

-सुषमाश्री

कल्पना नवरेकर मुंबई के कमर्शियल फोर्ट जिले में स्थित दो आफिस बिल्डिंग्स के बीच ​मौजूद रामशैकल स्लम में रहती है. वहां से जो सबसे करीब सार्वजनिक शौचालय है, उसकी दूरी तय करने में पैदल 15 मिनट का समय लग जाता है. नारवेकर और उसके तीन युवा बच्चे या तो सार्वजनिक शौचालय का इस्तेमाल करते हैं या फिर सड़क किनारे ही खुद को हल्का कर लेते हैं, जैसा कि अक्सर हो ही जाता है. उनके बेटों के लिये ऐसा करना कोई बड़ी समस्या नहीं है लेकिन नवरेकर और उसकी बेटी को हर बार सार्वजनिक शौचालय जाना ही पड़ता है. चूंकि हर बार उनके लिये ऐसा कर पाना मु​मकिन नहीं होता, इसलिए कई बार उन्हें सड़क किनारे अनजान लोगों के बीच ही शौच से निवृत्त होने का जोखिम उठाना पड़ जाता है.

एक बार की बात है. उसकी बेटी उन दिनों डायरिया से पीड़ित थी, इसलिये बहुत देर तक खुद को हल्का करने से रोक नहीं पाती थी और मजबूरन उसे उस व्यस्त सड़क के किनारे ही हल्का होना पड़ता था, जहां से गुजरने वाले अनजान लोग, खासकर पुरुष इस दौरान उसे गंदे कमेंट्स करते थे, जो उसे मजबूरन चुपचाप सहना पड़ता था. बता दें कि भारत में सार्वजनिक शौचालयों की कमी एक बड़ी समस्या है. खासकर महिलाओं के लिये यह समस्या और भी मुश्किलें पैदा करने वाली हो जाती है, न केवल उनके स्वास्थ्य को लेकर बल्कि उनके शरीर के उन गुप्तांगों की सुरक्षा और सुविधा को लेकर भी. इसके बावजूद देखा गया है कि सार्वजनिक स्थलों पर जो भी सुविधायें मुहैया की जाती हैं, वे खासतौर पर ​पुरुषों को ध्यान में रखकर की जाती हैं.

साल 2012 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश की व्याव​सायिक राजधानी मानी जाने वाली मुंबई में पुरुषों के लिए जितने सार्वजनिक शौचालय मौजूद हैं, उनकी तुलना में महिलाओं के लिए आधे ही सार्वजनिक शौचालय उपलब्ध हैं. यही नहीं, ​इनमें से जितने भी सार्वजनिक शौचालय उपलब्ध हैं, वे भी न तो स्वच्छ हैं और न ही इनमें हाइजीन का ध्यान रखा गया है. यानि कि महिलाओं के स्वास्थ्य की दृष्टि से इन्हें पूरी तरह से असुरक्षित कहा जा सकता है.

साल 2017 में ActionAid India द्वारा किये गये एक अध्ययन में पाया गया कि देश की राजधानी दिल्ली में 229 सार्वजनिक शौचालय मौजूद हैं. इनमें से 35 प्रतिशत ऐसे हैं, जहां महिलाओं के लिए अलग से शौचालय की सुविधा उपलब्ध नहीं है. जबकि 53 प्रतिशत ऐसे हैं, जहां पानी की सुविधा नहीं है और 45 प्रतिशत ऐसे हैं जहां दरवाजे बंद करने की सुविधा नहीं है.

साल 2017 में ActionAid India द्वारा किये गये एक अध्ययन में पाया गया कि देश की राजधानी दिल्ली में 229 सार्वजनिक शौचालय मौजूद हैं. इनमें से 35 प्रतिशत ऐसे हैं, जहां महिलाओं के लिए अलग से शौचालय की सुविधा उपलब्ध नहीं है. जबकि 53 प्रतिशत ऐसे हैं, जहां पानी की सुविधा नहीं है और 45 प्रतिशत ऐसे हैं जहां दरवाजे बंद करने की सुविधा नहीं है.

वैश्विक तौर पर भी महिला अधिकारों को लेकर किये गये आंदोलनों में महिलाओं और पुरुषों के शौचालयों का मुद्दा हमेशा ही गंभीरता से उठाया जाता रहा है. साल 2012 में चीन में भी महिलाओं ने शौचालयों की कमी को लेकर आंदोलन किया. उन्होंने कहा कि वे न चाहते हुये भी पुरुषों के शौचालयों में जाने के लिए मजबूर होती हैं. अमेरिका में हालात ऐसे हो गये थे कि वहां की विधायिका को महिलाओं के लिये अलग से शौचालयों की व्यवस्था करने को लेकर सख्त कानून बनाना पड़ा. सभी व्यावसायिक स्थानों में महिलाओं के लिये अलग से शौचालयों की सुविधा का इंतजाम करना जरूरी कर दिया गया.

अगर हम इस विषय पर गंभीरता से विचार करें तो यह साफ हो जायेगा कि आज के तथाकथित नारीवादी आंदोलनों के लिये पॉटी पैरिटी आंदोलन (यानि जिसमें पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के लिये भी एक समान शौचालयों की उपलब्धता पर बात की जाये) कभी भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं रहा. जबकि उन्हें इसकी गंभीरता को ध्यान में रखते हुये इसके महत्वपूर्ण प्रभावों को समझना चाहिए और इस मुद्दे को गंभीरता से उठाते हुये इन समस्याओं का हल निकालने पर काम भी करना चाहिए.

शोधों पर गहराई से विचार करें तो हम पायेंगे कि महिलाएं पुरुषों के मुकाबले शौचालयों में दोगुना ज्यादा समय बिताती हैं. महिलाओं के लिए शौचालय केवल शौच करने का स्थान ही नहीं होती, बल्कि वह उसे सामाजिक रूप से भी सुरक्षित स्थान देती है. the father of potty parity और George Washington University के law professor John Banzhaf के मुताबिक, महिलाओं के लिये शौचालय में पुरुषों के मुकाबले दोगुना समय लगने के पीछे कई कारण हैं. पुरुषों के लिये यह केवल पैंट की जिप नीचे खिसकाने भर की देर है और वे यूरिनल में आसानी से खुद को हल्का कर लेते हैं जबकि इसके ठीक उलट महिलाओं के लिए उन्हें पहले अपने कपड़े के बटन खोलने, उनके पैंट्स नीचे करने और टॉयलेट सीट के साथ ठीक से बैठने तक की यह एक लंबी प्रक्रिया हो जाती है, तब जाकर वे हल्की हो पाती हैं.

पुरुषों के मुकाबले अधिक उम्र की महिलाओं के लिए भी शौचालय में अधिक समय लगना सामान्य सी बात है. यही वजह है कि पुरुषों के शौचालयों में यदि यूरिनल्स महिलाओं की तुलना में कम हों, तो भी वे तेजी से शौच निवृत्त होकर बाहर आ जाते हैं जबकि महिलाएं ऐसा कर पाने में अक्षम होती हैं.

चार में से एक महिला इस दौरान मासिक चक्र से भी गुजर रही होती हैं. इस दौरान उन्हें अपने सैनिटरी पैड्स बदलने और प्रयोग किये जा चुके पैड्स को अच्छी तरह पैक करके डस्टबिन में डालने तक का काम भी पूरा करना होता है. इसी बीच कुछ महिलाएं ऐसी भी होती हैं, जिनके साथ बच्चे होते हैं और उन्हें खुद शौच निवृत्त होने से पहले बच्चों को शौच करवाना होता है. यही नहीं, पुरुषों के मुकाबले अधिक उम्र की महिलाओं के लिए भी शौचालय में अधिक समय लगना सामान्य सी बात है. यही वजह है कि पुरुषों के शौचालयों में यदि यूरिनल्स महिलाओं की तुलना में कम हों, तो भी वे तेजी से शौच निवृत्त होकर बाहर आ जाते हैं जबकि महिलाएं ऐसा कर पाने में अक्षम होती हैं.

indianexpress.com की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बेंजफ कहते हैं कि शौचालय का इस्तेमाल करना एक ऐसी समस्या है, जिसे आप नकार नहीं सकते न ही हटा सकते हैं इसलिए महिलाओं को भी ऐसा करने के लिये कहना उनके समानता के अधिकार को नकारने के समान है. वहीं शौचालय का प्रयोग करने के लिए एक लंबी लाइन में लंबा इंतजार करना भी ऐसी ही एक अलग और गंभीर समस्या है. बेंजफ कहते हैं कि अक्सर महिलाएं देर तक शौच को रोके रखने की समस्या के कारण अन्य कई तरह की बीमारियों की चपेट में आ जाती हैं. और ऐसा सिर्फ इसलिए होता है क्योंकि उन्हें सार्वजनिक स्थल पर सामाजिक हितों का ध्यान रखते हुये खुले में शौच करने से मना किया जाता है और उनके लिये आवश्यक स्वच्छ, साफ, हाइजीनिक और पानी और दरवाजों की उचित व्यवस्था वाले शौचालयों की हर जगह व्यवस्था नहीं की जाती.

बेंजफ यह भी कहते हैं कि कई बार तो महिलाओं को घर से बहुत दूर तक शौचालय के लिये जाना उन्हें उनके घर तक पहुंचने से पहले ही रास्ते से उन्हें भटका भी सकता है या कहें कि उन्हें लंबे रास्तों की वजह से यह भय भी सताता रहता है कि कहीं बीच में कोई असामाजिक तत्व उनके साथ दुर्व्यवहार न करे.

पुरुष प्रधान क्षेत्रों, जैसे कि कंस्ट्रक्शन और एग्रीक्लचर वर्क में महिलाओं के लिए शौचालयों की उचित व्यवस्था का न होना भी उन्हें वहां काम करने से रोकता है. साल 2004 में मुंबई के एक रिपोर्टर दानिश खान शहर के रेलवे स्टेशनों पर जाकर कई शौचालयों का सर्वे किया था. उसने अपनी रिपोर्ट में पाया था कि ज्यादातर स्टेशनों पर शौचालयों में ड्रेनेज की प्रॉपर सुविधा उपलब्ध न होने की वजह से उन्हें बंद कर दिया गया था, जिससे खासतौर से महिलाओं को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था. अपने अध्ययन में उसने यह निष्कर्ष निकाला था कि यही वजह थी कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट से महिलाएं सफर करने से बचने की कोशिश करती थीं. इतना ही नहीं, कई बार तो इसके कारण वे अपने काम को पूरा समय भी नहीं दे पाती थीं.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं के लिये न केवल शौचालय की उचित व्यवस्था किया जाना जरूरी है बल्कि उसे महिलाओं की जरूरतों के मुताबिक तैयार करना और तैयार रखना भी उतना ही आवश्यक है. यह बेहद जरूरी है कि महिलाओं के शौचालयों में मासिक धर्म के दौरान प्रयोग की जाने वाली सभी जरूरी सुविधायें भी मौजूद हों, खासकर सैनिटरी नैपकिन, डिस्पोजल्स और डस्टबिन्स. ऐसा हुआ ​तो कभी कभार अचानक उन्हें सैनिटरी नैपकिन्स पास में उपलब्ध न होने की वजह से जो घर की ओर भागने को मजबूर होना पड़ता है, वह नहीं होगा.

लाओं के लिये न केवल शौचालय की उचित व्यवस्था किया जाना जरूरी है बल्कि उसे महिलाओं की जरूरतों के मुताबिक तैयार करना और तैयार रखना भी उतना ही आवश्यक है. यह बेहद जरूरी है कि महिलाओं के शौचालयों में मासिक धर्म के दौरान प्रयोग की जाने वाली सभी जरूरी सुविधायें भी मौजूद हों, खासकर सैनिटरी नैपकिन, डिस्पोजल्स और डस्टबिन्स. ऐसा हुआ ​तो कभी कभार अचानक उन्हें सैनिटरी नैपकिन्स पास में उपलब्ध न होने की वजह से जो घर की ओर भागने को मजबूर होना पड़ता है, वह नहीं होगा.

ऐसे समय से बचने के लिए हर महिला को Period tracking apps जैसे कि Oky को अपने फोन पर जरूर enable करके रखना चाहिए. इससे महिलाएं वैसी जगहों और वैसे समय के लिए भी तैयार रह पाएंगी, जहां और जब उन्हें सैनिटरी की जरूरत हो और वह आसानी से उन्हें उपलब्ध भी हो सके. कम से कम उन्हें ऐसे इमरजेंसी सिचुएशंस में menstrual cup तो मिल जाए. इससे सैनिटरी नै​पकिन्स की समस्या भी दूर हो जाएगी.

भारत जैसे देश में तो यह समस्या और भी बड़ी और गंभीर है, जहां आज भी जाति और वर्ग भेद के कारण बड़े बड़े होटलों तक में अलग अलग दरवाजे बनाये जाते हैं. फिर वहां शौचालयों में अलग अलग दरवाजों की सुविधा भला कहां से की जा सकती है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान ने आगे बढकर घरों में महिलाओं के लिए शौचालयों की सुविधाएं उपलब्ध कराने का काम बड़े पैमाने पर किया.

स्वच्छ भारत वेबसाइट के अनुसार, इस अभियान के तहत देश में 106 मिलियन शौचालयों का निर्माण किया गया है, जिसमें हमारे गांव भी शामिल हैं. वेबसाइट के मुताबिक, सात साल पहले जब यह अभियान शुरू किया गया था, तब 33 प्रतिशत तक इस पर काम किया जा सका था, जो आज शत प्रतिशत तक हो चुका है.

स्वच्छ भारत वेबसाइट के अनुसार, इस अभियान के तहत देश में 106 मिलियन शौचालयों का निर्माण किया गया है, जिसमें हमारे गांव भी शामिल हैं. वेबसाइट के मुताबिक, सात साल पहले जब यह अभियान शुरू किया गया था, तब 33 प्रतिशत तक इस पर काम किया जा सका था, जो आज शत प्रतिशत तक हो चुका है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अध्ययन में यह दावा किया गया है कि 2014 से 2019 तक डायरिया और कुपोषण की वजह से भारत में होने वाली मौतों में 3 लाख तक की कमी आई है. इस अभियान में अब तक $14 billion खर्च किये जा चुके हैं लेकिन इसके अभूतपूर्व परिणाम सामने आये हैं. इसके बावजूद अब भी बहुत काम होने बाकी हैं. क​मर्शियल इलाकों में अब भी जितने सार्वजनिक शौचालय हैं, वे तुलनात्मक रूप से अब भी कम हैं. यही नहीं, रेस्टोरेंट्स और बार आदि में भी जो शौचालय होते हैं, वे केवल उनके ग्राहकों के उपयोग के लिये ही होते हैं, बहुत से गरीब लोग वहां प्रवेश से भी डरते हैं. शहरों में महिलाओं के लिये जो सार्वजनिक शौचालय उपलब्ध हैं, वहां ज्यादा भीड़ होती है और वहां हाइजीन का भी ध्यान नहीं रखा जाता. महिलाओं के लिये जो शौचालय होते हैं, अगर पुरुष भी उनका ही इस्तेमाल करते हों तो उससे महिलाओं के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव होता है. वहीं, पुरुषों के लिये जितने यूरिनल्स उपलब्ध कराये जाते हैं, कम से कम उसके दोगुने महिलाओं के लिये शौचालयों की सुविधा अवश्य होनी चाहिए.

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यह सब देखते हुये कहना होगा कि महिलाओं के प्रति यह समाज क्रूरता दिखाता है, खासकर उनके वर्कप्लेस में और सार्वजनिक स्थलों पर, मानो जैसे महिलाओं पर वे इस बात का जोर डाल रहे हों कि वे घर पर ही रहें. पॉटी पैरिटी यानि महिलाओं के लिये शौचालय पर बात करने वाले बेहद कम हैं या फिर कहें कि लोग इस मुद्दे पर बोलने से झिझकते हैं. जबकि महिलाओं के ​साथ इस मुद्दे पर जिस तरह का भेदभाव किया जाता है, उसे दूर करने की जरूरत है, उस पर हर स्तर से बेहतर काम करने की जरूरत है. उम्मीद की जा सकती है कि इस क्षेत्र में जो भी निवेश और नियम बनाये गये हैं, उसका फायदा नवरेकर की बेटी और उसके बच्चों को भी मिल पायेगा ताकि उसे अपने बच्चों और अपने स्वास्थ्य को लेकर चिंता करने की जरूरत नहीं होगी और न ही बार बार जब भी उसे शौच जाना हो, तो उसके लिये ही किसी भी तरह की चिंता रह जायेगी.

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