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यूपी में कांग्रेस और बसपा का राजनीतिक भविष्य

वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी से कुमार भवेश चंद्र की बातचीत

कांग्रेस हो या फिर बहुजन समाजवादी पार्टी, दोनों ही पार्टियां आज यूपी में तीसरे और चौथे नंबर की पार्टी बनी हुई हैं। दोनों ही पार्टियों की एक सबसे बड़ी कमजोरी यह रही है कि उन्होंने अपने दलों से जुड़े लोगों या जातियों को सत्ता में जगह नहीं दी।

जहां तक कांग्रेस की बात है तो इसमें कोई शक नहीं कि यूपी प्रभारी और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा लंबे समय से यूपी में सड़क पर विपक्ष की भूमिका में दिख रही हैं। लखीमपुर खीरी हो, सोनभद्र में आदिवासियों, सीएए या फिर अन्य मुद्दे, प्रियंका ने मुख्य विपक्षी पार्टी की भूमिका निभाते हुये वहां अपनी उपस्थिति दर्ज की, लेकिन इसके बावजूद उन्हें इसका बहुत ज्यादा फायदा मिलता नहीं दिख रहा।

इस पर वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं कि इंदिरा गांधी के जमाने से ही कांग्रेस की यह नीति रही है कि वे पौधा लगाते हैं और फिर बीच बीच में उसे निकालकर देखते रहते हैं कि कहीं वह जड़ तो नहीं पकड़ रहा। यही का प्रियंका गांधी ने भी कांग्रेस पार्टी में फेरबदल के वक्त किया। पार्टी की इस गलती का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है। निचले स्तर पर कांग्रेस के विधायकों और नेताओं को यह बात हजम नहीं हो पाती। नतीजतन, वे पूरे मन से पार्टी के साथ नहीं रह पाते। यही वजह है कि ​मुख्य विपक्षी पार्टी की भूमिका निभाने के बावजूद कांग्रेस को यूपी की राजनीति में वह स्थान नहीं मिल पाता।

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जहां तक जातियों का गणित है तो पार्टी अपने साथ दलित, मुस्लिम और ब्राह्मण समुदाय को भी जोड़ नहीं पायी है। इसके पीछे भी कई फैक्टर्स हैं। वहीं, मुस्लिमों ने तो साफ तौर से अपना मन बना लिया है कि यूपी में जो भी पार्टी भाजपा को हरायेगी, हम उन्हीं के साथ जायेंगे। और वे आखिर तक देखेंगे कि किस पार्टी में वो दमखम है। फिलहाल, कांग्रेस में तो वो दम नहीं दिखता।

दूसरी ओर, मायावती भी अपने भाई आनंद कुमार और भतीजे को आईटी विभाग के छापे से बचाने के लिये शांत बैठ गई हैं। वैसे भी 2019 के चुनावों के बाद से ही उन्हें बीजेपी की बी पार्टी के तौर पर ज्यादा देखा जा रहा है। माना जाता है कि बीजेपी चाहती है कि उनका दलित वोट भी मायावती के शांत रहने से उनकी झोली में आ जाय। जबकि बीजेपी का ब्राह्मण वोट खुद भी उनसे दूर जाता दिख रहा है।

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