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बीजेपी के लिये कितना सुरक्षित है पश्चिम यूपी का किला?

राजकाज में चर्चा : मीडिया स्वराज के वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी और द ​इंडियन पोस्ट के कुमार भवेश चंद्र के साथ…

कुमार भवेश चंद्र

आपको मालूम है कि उत्तर प्रदेश में पश्चिमी यूपी से चुनाव शुरू होंगे और पश्चिमी यूपी में इस बार बहुत कुछ हुआ है. पिछले चुनाव के मुकाबले इस बार स्थितियां ढेर सारी बदल गयी हैं. क्या है नई परिस्थितियां और क्या है वहां का सीन, इस पर उत्तर प्रदेश की राजनीति पर गहरी नजर रखने वाले कुछ वरिष्ठ पत्रकारों से आज हम बात करेंगे. ये हैं… अति वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी जी, नोयडा से वरिष्ठ पत्रकार शंभु नाथ शुक्ला जी, लखनऊ से वरिष्ठ पत्रकार नागेंद्र जी, जदीद मरकज अखबार के संपादक हिसाम सिद्दिकी साहब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जानकारी रखने वाले दो युवा विजय राज चौधरी और सचिन मलिक.

इस चर्चा में खासतौर से ये बात होगी कि उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन के बाद ये माना जा रहा था कि परिस्थितियां बदल गयी हैं. किसान इस बार नाराज हैं भारतीय जनता पार्टी से, इसलिये पिछले चुनाव में भाजपा ने वहां जो एक रिकॉर्ड कायम किया था, पहली बार इतनी बड़ी कामयाबी मिली थी भारतीय जनता पार्टी को. और क्या इस बार उसका असर वैसा नहीं है ​जैसा कि वो उम्मीद कर रही थी. हालांकि, कोशिश बहुत हो रही है और शनिवार को देश के गृहमंत्री और भाजपा के पूर्व अध्यक्ष अमित शाह ने कैराना में जाकर डोर टू डोर कैंपेन किया है. कैराना से शुरुआत उन्होंने की है, इसका मतलब हम सब समझ रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी क्या करना चाहती है वहां, किस तरह की सियासत को आगे बढ़ाना चाहती है, तो इन तमाम सवालों पर हम चर्चा करेंगे. वहां के क्या नये सामाजिक समीकरण हैं. सबसे पहले शंभु नाथ जी आप बताइये कि 2017 के मुकाबले क्या बदला हुआ है इस बार?

शंभु नाथ जी

सबसे पहले तो इस बार जो किसान आंदोलन हुआ, चूंकि किसान आंदोलन में सारी भूमिका मेरठ, सहारनपुर, मुरादाबाद और उत्तराखंड के किसान आये हुये थे. जाहिर है जिस तरह से इतना लंबा आंदोलन चला, शायद इतना लंबा आंदोलन कोई नहीं चला, एक साल तो चल ही गया था, जब वापसी की घोषणा हुई कि हम कृषि कानून वापस ले रहे हैं तो वो 19 नवंबर 2021 की तारीख थी यानि की एक साल तो हो ही गया था, 26 नवंबर 2020 से धरना शुरू हुआ था. तो इतने लंबे किसान आंदोलन में एक सरकार के प्रति असंतोष तो बढ़ा, इसमें कोई शक नहीं. लेकिन जो पिछली बार 2013 के बाद से समीकरण बिगाड़ दिये गये थे, वही हाल फिर से लग रहा है, क्योंकि अमित शाह और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शुरुआत कहां से की? कैराना.

कैराना वो जगह है जो तहसील है, कस्बा है, लेकिन उसमें मुस्लिम आबादी लगभग 80 से 90 प्रतिशत के बीच है. पश्चिमी यूपी के जिन मंडलों, मेरठ मंडल, सहारनपुर मंडल, मुरादाबाद मंडल, की बात मैंने की, इनमें मुस्लिम आबादी बहुत ज्यादा है और वो आबादी एक तरह से डिसाइडिंग है लेकिन यहां जो मुस्लिम आबादी है, वो या तो जाट है या गुर्जर है या फिर त्यागी है. तो हिंदू और मुसलमानों के बीच… जैसे कैराना सीट से हुकुम सिंह जी लड़ते थे और वे गुर्जर थे और चूंकि कैराना गुर्जरों की आबादी है, तो हिंदू गुर्जर या मुस्लिम गुर्जर ने उनको वोट दिया. उसी तरह उससे पहले जो हसन परिवार से खड़े होते थे, वो भी गुर्जर थे… चूंकि सारे लोग गुर्जर थे और सारे लोग एक साथ वोट करते थे तो हसन परिवार को भी सारे गुर्जरों का वोट मिलता था. जैसे अभी ​सिवाल खास का मामला उठा. सिवाल खास में गुलाम मोहम्मद चौहान को टिकट मिला है तो जाटों ने उसका विरोध शुरू किया. उन्होंने कहा कि ये सीट तो जाटों की है तो किसी जाट को यहां से टिकट मिलना चाहिये. मजे की बात कि गुलाम मोहम्मद को पहले आरएलडी से टिकट दिया समाजवादी पार्टी ने. वे पहले समाजवादी पार्टी में थे और 2012 में वे समाजवादी पार्टी से सीट जीते भी थे. तब गुलाम मोहम्मद कहते थे, मैं तो जाट ही हूं. मुझे क्या फर्क पड़ रहा है. वाकई में हिंदू जाट और मुस्लिम जाट जैसा कुछ था नहीं. न कहीं हिंदू गुर्जर, मुस्लिम गुर्जर या हिंदू राजपूत… जैसी कोई बात वहां नहीं होती थी. बहुत सारे लोग वहां बहुत फक्र से बता देंगे कि मैं तो मुस्लिम हूं, लेकिन मुस्लिम राजपूत हूं या मुस्लिम गुर्जर हूं… टाइप. आपको बुलंदशहर और खुर्जा में ऐसी बातें खूब दिख जायेंगी. कोई भी मुसलमान वहां बतायेगा कि मैं तो मुस्लिम जाट हूं या मुस्लिम गुर्जर हूं या मुस्लिम त्यागी हूं, जिन्हें मैसरा बोलते हैं… तो इस तरह से जहां एक तरह से सामाजिक समरसता रही हो, वहां एक बार फिर से कैराना खड़ा हो गया. और जब कैराना खड़ा हो गया तो जहां इस तरह के सेंसिटिव मामले होते हैं, उनमें बीजेपी बड़े मजे से डिविजन कर देती है. फिर हिंदू अलग हो जाता है, मुसलमान अलग हो जाता है. एक तो ये रहा है.

दूसरे, कोविड के कारण ये किया गया है कि रैली नहीं होगी. न रैली होगी न बंद कमरों में मीटिंग भी उस तरह से नहीं होगी तो अब हमारे दिमाग में क्या रह जाता है? सिर्फ बचती है सोशल मीडिया.

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