Wednesday , September 15 2021

चर्नलिज्म और जर्नलिजम क्या फ़र्क़ है!

चर्नलिज्म दो शब्दों से मिलकर बना है, चर्न और जर्नलिजम। चर्न का शाब्दिक अर्थ है किसी मशीन द्वारा दूध या क्रीम को फेंट या मथकर उससे मक्खन बनाना। चर्न को अगर हम पत्रकारिता के संदर्भ में देखें तो चर्नलिज्म का अर्थ हुआ ऐसी पत्रकारिता जो प्रेस रिलीज़ या समाचार एजेंसियों की खबरों पर आश्रित हो।

जब मीडिया संस्थान खबरों के लिए घटना स्थल पर अपने पत्रकारों को ना भेजें और ख़बर के लिए समाचार एजेंसी पर आश्रित हो जाएं या प्रेस रिलीज़ आधारित खबरें प्रकाशित या ब्रॉडकास्ट करने लग जाएं तो ऐसी पत्रकारिता को चर्नलिज्म कहा जाता है।

आजकल न्यूज़ मीडिया में इसका ट्रेंड तेज़ी से बढ़ रहा है। मीडिया संस्थानों का हित ये है कि चर्नलिज्म करने से उन्हें बड़ी संख्या में पत्रकार रखने की ज़रूरत नहीं होती, ऐसा करके वो पत्रकारों को दी जाने वाली तनख्वाह का पैसा बचा लेते हैं और प्रेस रिलीज़ आधारित पत्रकारिता का एक फायदा और मिल जाता है, वो यह कि जिस संस्थान की प्रेस रिलीज़ को वो अपने अख़बार या टेलिविजन चैनल में जगह देते हैं उनसे उन्हें विज्ञापन भी मिल जाता है।

चर्नलिज्म किसी पत्रकार के लिए एक धीमा ज़हर है। अच्छी ख़बर कभी भी डेस्क पर बैठने से नहीं मिलती उसके लिए पत्रकार को बाहर निकलना पड़ता है, लोगों से मिलना पड़ता है, अपने आसपास हो रही घटनाओं पर पैनी नज़र रखनी पड़ती है तब जाकर एक अच्छी ख़बर मिलती है।

ख़बर के बारे में तो कहा भी जाता है कि “जो बताया जाए वो ख़बर नहीं है बल्कि ख़बर तो वह है जिसे छुपाया जाए। बाकी सब तो पीआर है।”

 इस टर्म को दिया था बीबीसी के पत्रकार वसीम ज़ाकिर ने। उनका कहना है कि पत्रकारिता में चर्नलिज्म बहुत बढ़ गया है कई खबरों की पड़ताल करने पर पता चलता है  कई खबरें तो सच भी नहीं होती। हमें पत्रकारिता के इस कंपनीकरण को वक्त रहते रोकना होगा।

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नागरिक पत्रकार और खबर

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