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क्यों बढ़ती जा रही है बेरोजगारी?

देश में बेरोजगारी लगातार बढ़ती ही जा रही है. इस समय पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, लेकिन बेरोजगारी कहीं भी मुद्दा नहीं दिख रहा. ऐसा क्यों है? इन सारे सवालों पर इंस्टिट्यूट आफ सोशल साइंसेज, JNU के जाने माने प्रोफेसर अर्थशास्त्री अरुण कुमार से चर्चा कर रहे हैं मीडिया स्वराज से वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी जी और द​ इंडियन पोस्ट के संपादक कुमार भवेश चंद्र.

रामदत्त त्रिपाठी का सवाल

सर, रेलवे भर्ती मामले में कुल पदों की संख्या 1 लाख 40 हजार थी, लेकिन उसके लिये ढ़ाई करोड़ लोगों ने अप्लाई किया. पिछले कुछ वर्षों या कहें कि दशकों में देश में जिस तरह से बेरोजगारी बढ़ी है, उस पर किसी भी सरकार ने गंभीरता से न तो विचार किया है और न ही कुछ करने की सोच रहे हैं. जबकि देश में मैनुफैक्चरिंग की भी खूब बातें होती हैं, जैसा कि आप लोग कहते हैं कि जॉबलेस ग्रोथ भी देश में काफी बढ़ा है. ​लेकिन क्या वजह है कि देश में रोजगार के अवसर नहीं बढ़ रहे?

अर्थशास्त्री अरुण कुमार का जवाब

सीधी सी बात है कि जिस तरह की नीतियां हम अपना रहे हैं, उससे अर्थव्यवस्था में रोजगार नहीं पैदा होता है. सन् 1991 के बाद हमने नई आर्थिक नीतियों को अपनाया और उसके चलते जो ये सारी नीतियां हैं, ये प्रो बिजनेस नीतियां हैं, जिसको सप्लाई साइड कहते हैं, और ये मार्केट के आधार पर है या​नी कि बाजारीकरण के आधार पर है. यानी बाजार आगे है और समाज पीछे है.

बाजार की जो नीतियां होती हैं, उसमें डॉलर वोट चलता है. डॉलर वोट का मतलब है कि अगर मेरे पास एक डॉलर है तो एक वोट है और अगर एक लाख डॉलर है तो एक लाख वोट है. तो बाजार में उसकी चलेगी जिसके पास एक लाख डॉलर है, जिसके पास एक डॉलर है, उसकी नहीं चलेगी. अभी पूंजी वहां जाती है, जहां बाजार है. जैसे अगर हम उत्तर प्रदेश की बात करें तो जो पूंजी है वो बांदा में नहीं जायेगी, वो जायेगी आसपास के इलाकों में, जैसे कि दिल्ली और एनसीआर नोएडा और गाजियाबाद जैसे इलाकों में. यानी यूपी का मतलब बांदा नहीं है, उसका मतलब है नोएडा और गाजियाबाद. कानपुर जो कभी इं​डस्ट्रीयल शहर होता था, अब वहां उद्योग धंधे बंद हो चुके हैं.

इन नीतियों की वजह से हमारे देश की अर्थव्यवस्था का 80 प्रतिशत तो संगठित क्षेत्र में केवल छह प्रतिशत लोग काम करते हैं जबकि जो असंगठित क्षेत्र जहां 94 प्रतिशत लोग काम करते हैं, वहां निवेश केवल 20 प्रतिशत है. कृषि, जहां 45 प्रतिशत लोग काम करते हैं वहां केवल 5 प्रतिशत निवेश किया जाता है. 45 प्रतिशत लोगों के लिये 5 प्रतिशत निवेश और 6 प्रतिशत लोगों के लिये 80 प्रतिशत का निवेश किये जाने के बावजूद दोनों ही जगहों पर रोजगार पैदा नहीं हो रहे क्योंकि संगठित क्षेत्र, जहां से रोजगार पैदा होना चाहिये था, वहां ज्यादातर काम मशीनें करती हैं. जैसे बैंकिंग सेक्टर को ही ले लीजिये. बैंकों में इतना आटोमेशन हो गया है कि आपको बैंक जाने की जरूरत ही नहीं है. सारे काम मशीनें कर देती हैं. इसे ही हम जॉबलेस ग्रोथ बोलते हैं. दूसरी ओर, कृषि क्षेत्र में भी ज्यादातर काम बुलडोजर, ट्रैक्टर वगैरह से हो रहा है. अगर एक यूनिट भी फायदा हो रहा है कृषि में तब भी वहां रोजगार जीरो प्रतिशत पैदा हो रहा है, लेकिन 45 प्रतिशत लोग वहां पर हैं.

हमारे देश में रोजगार नहीं बढ़ रहा है लेकिन बेरोजगारी का आंकड़ा भी बढ़ता नहीं दिखता है. वजह यह है कि हमारे यहां सोशल सिक्योरिटी नहीं है. अगर आपको रोजगार नहीं मिल रहा हो तो आप ये नहीं कहेंगे कि मैं घर बैठ जाऊंगा, जब तक मेरे मुताबिक काम नहीं मिल जायेगा. अमेरिका, ब्रिटेन या यूरोप में तो आपको बेरोजगारी भत्ता मिलता है तो वहां तो आप इंतजार कर सकते हैं जब तक कि आपको सही काम न मिले. तो हमारे यहां पेट भरने के लिये इस बीच लोग ठेला चलायेंगे, रिक्शा चलायेंगे या सिर पर बोझा उठायेंगे तो उनको मान लिया जायेगा कि उनको रोजगार मिल गया. तो बेरोजगारी का जो आंकड़ा पहले 3-4 प्रतिशत के आसपास रहता था, अब वो 7-8 प्रतिशत के आसपास रहता है. पर वो ज्यादा बढ़ता नहीं दिखता तो हमारे यहां अंडर एम्प्लॉयमेंट बढ़ जाता है. रिक्शा वाला अगर अपने स्टैंड पर 12 घंटे खड़ा रहता है तो उसको दो-तीन घंटे का काम मिलता है. ऐसा ही हाल ठेली वाले, चना मूंगफली बेचने वाले, सब पर लागू होता है, लेकिन उन सभी को रोजगार मान लिया जाता है. यानी हमारे यहां डिसगाइज एम्प्लॉयमेंट है कृषि में और अंडर एम्प्लॉयमेंट है बाकी सब जगहों में. यही वजह है कि हमारे यहां बेरोजगारी का आंकड़ा ज्यादा नजर नहीं आता.

रामदत्त त्रिपाठी का सवाल

सर, हमारे पास चाहे बेरोजगारी का आंकड़ा न हो पर ये आंकड़ा तो है कि सरकार को 80 करोड़ लोगों को अनाज देना पड़ रहा है. अगर उनके पास रोजगार होता तो सरकार को उन्हें अनाज नहीं देना पड़ता. तो क्या हम मान सकते हैं कि ये 80 करोड़ तो कम से कम बेरोजगार हैं ही. या​ फिर इनको प्रॉपर रोजगार नहीं है. ये आत्मनिर्भर नहीं हैं.

अर्थशास्त्री अरुण कुमार का जवाब

आपने ये सही कहा कि ये आत्मनिर्भर नहीं हैं. पर रोजगारी का जब आप आंकड़ा गिनते हैं तो उसमें कोई न कोई कुछ कर रहा होगा. दो चीजें होती हैं. एक तो, आपकी तनख्वाह कितनी है? और दूसरी, आपको कितने घंटे काम मिल रहा है? अगर आपको दो घंटे ही काम मिल रहा है तो आपकी आमदनी कम हो जायेगी. तनख्वाह चाहे ज्यादा भी हो लेकिन अगर आपके पास काम कम है तो आप अपने पूरे परिवार का खर्चा नहीं चला सकते हैं. जैसे कि मनरेगा स्कीम के तहत 100 दिन का काम एक परिवार को साल में मिल सकता है. यानी कि अगर पांच व्यक्तियों का परिवार है तो हरेक व्यक्ति पर 20 दिन का काम. अब 20 दिन के काम में 365 दिन के काम का आप खर्चा कैसे चलायेंगे? दूसरी बात ये है कि आज 100 दिन के काम के बजाय 50 दिन का ही काम मिल रहा है. यानी कि प्रति व्यक्ति 10 दिन का ही काम मिल रहा है.

अगर आपके पास कोई दूसरा काम नहीं है आप केवल मनरेगा स्कीम के तहत अपना काम चला रहे हैं, तो आप तो भूखे हैं. इसलिये ये तो नहीं कह सकते हम कि 80 करोड़ के पास रोजगार नहीं है पर हां, 80 करोड़ गरीब हैं क्योंकि उनकी आमदनी सही नहीं है. इसलिये हमारे यहां जो बेरोजगारी का आंकड़ा है, वो ज्यादा दिखता नहीं है. इसलिये हम ये कह सकते हैं कि रोजगार और पैदा होना चाहिये. चाहे वो रूरल एम्प्लॉयमेंट गारंटी स्कीम के तहत मिले. हालांकि, जरूरत तो इस बात की भी है कि शहरों में भी अर्बन गारंटी ​स्कीम के तहत लोगों को काम दिया जाना चाहिये क्योंकि ऐसा नहीं है कि बेरोजगारी केवल गांवों में ही है, बल्कि वे शहरों में भी है.

शहरों में जो युवक हैं, उनको नौकरी नहीं मिल रही है और जो रेलवे की बात आपने कही कि यहां पर बहुत हंगामा हुआ तो वो इसीलिये कि छात्रों में हताशा और निराशा है. 2019 में जो तकरीबन सवा लाख नौकरियां निकली थीं, जिसके लिये करीब दो करोड़ 30 लाख लोगों ने अप्लाई किया, उसी तरह अगर आप उत्तर प्रदेश में देखें तो 2015 में 360 नौकरियां निकली थीं चपरासी की, और उसमें पांचवीं जमात पास चाहिये था, जबकि 380 पीएचडी ने अप्लाई किया, दो लाख एमटेक, बीटेक ने अप्लाई किया, कुल 23 लाख लोगों ने अप्लाई किया था, उसके लिये. ये आंकड़ा दिखाता है कि आपके बीटेक और एमटेक कर लिया, फिर भी नौकरी सही नहीं मिल रही तो आप पांचवीं पास चपरासी के पद के लिये भी अप्लाई करने के लिये तैयार हैं. तो ये हताशा और निराशा ही दिखाता है कि आपने कितनी भी डिग्री ले ली, लेकिन आपको उस डिग्री के मुताबिक काम नहीं मिल रहा है.

तो वजह इन सबकी यही है कि हमने सन् 1947 से ट्रिकल डाउन की नीति अपनायी है. ट्रिकल डाउन की नीति का मतलब ये है कि ऊपर-ऊपर डेवलपमेंट हो जाये और रिस्क जो है, वो नीचे चला जाये. लेकिन ऐसा हुआ नहीं हमारे देश में इसलिये दुनिया भर में जितने भी बड़े-बड़े राष्ट्र हैं, उनमें से सबसे ज्यादा असंगठित क्षेत्र हमारे यहां हैं. यही वजह है कि महामारी का असर भी सबसे ज्यादा हमारे यहां पड़ा. क्योंकि असंगठित क्षेत्र की पूंजी बहुत कम होती है, उसमें अगर आपका हफ्ता दस दिन काम न हो तो पूंजी खत्म हो जाती है. दुबारा काम शुरू करना मुश्किल होता है. और जो हमारी सरकार है वो जो माइक्रो सेक्टर है, यानी जो अंसगठित क्षेत्र है, उसकी तरफ ध्यान नहीं देती है. हमारे डेटा में भी उसका ध्यान नहीं है. चूंकि जीडीपी का जो डेटा आता है, उसमें ये मान लिया जाता है कि असंगठित क्षेत्र उसी तरह चल रहा है, जैसे संगठित क्षेत्र चल रहा है. जबकि संगठित क्षेत्र तो बढ़ रहा है क्योंकि वहां पर पूंजी जा रही है, वहां पर डिमांड है, लेकिन असंगठित क्षेत्र तो गिर रहा है. इसलिये मेरा मानना है कि जो सरकार कहती है कि हमारो रेट आफ ग्रोथ 8 प्रतिशत है या इस साल 9 प्रतिशत हो जायेगा या ​पिछले साल केवल साढ़े सात प्रतिशत गिरा, उसमें असंगठित क्षेत्र के आंकड़े नहीं आते हैं. तो पिछले साल जो सरकार कहती है कि ग्रोथ में साढ़े सात प्रतिशत की गिरावट हुई, मेरा मानना है कि वो 30 प्रतिशत की गिरावट थी, अगर असंगठित क्षेत्र को भी मिला लें. इस साल जो कह रहे हैं कि साढ़े नौ प्रतिशत की बढ़त होगी, मेरा मानना है कि जीरो प्रतिशत की बढ़त हो रही है क्योंकि असंगठित क्षेत्र तो उसमें गिना ही नहीं जा रहा है.

तो एक तरह से जो अंग्रेजी में कहते हैं न कि वो इनविजिबलाइज हो गया है. असंगठित क्षेत्र एक तरह से अदृश्य हो गया है हमारे डेटा में और हमारे पॉलिसी मेकर्स के लिये. उनकी यानी असंगठित क्षेत्र की तरफ वो ध्यान नहीं देते हैं और तरह तरह की परेशानी है तो इसलिये हमारे यहां जो बेरोजगारी है, यूथ को जो रोजगार नहीं मिल रहा है, उसके पीछे गलत नीतियां हैं. जब तक ये नीतियां सही नहीं की जायेंगी, तब तक कुछ सही नहीं हो पायेगा.

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