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क्या पिछड़ा समाज अब अखिलेश के पीछे खड़ा हो रहा है?

यूपी की राजनीति का मर्म समझने के लिए सुनिये. मुख्यमंत्री योगी और भाजपा UP के चुनाव को हिन्दू बनाम मुस्लिम के एजेंडे पर लड़ना चाहती है , लेकिन बीजेपी में पिछड़े और दलित वर्ग के कई बड़े नेताओं ने बग़ावत कर अखिलेश यादव से हाथ मिला लिया है. क्या बीजेपी अब भी धार्मिक ध्रुवीकरण करा पायेगी . राम दत्त त्रिपाठी के साथ चर्चा में शामिल हैं वरिष्ठ पत्रकार कुमार भवेश चंद्र, ब्रजेश शुक्ल और अमन

योगी जी पश्चिम यूपी में पलायन को बहुत बड़ा मुद्दा बना रहे थे, लेकिन चुनाव में जाने से पहले ही पलायन उनकी पार्टी में ही शुरू हो गया है। ज्यादातर लोग बीजेपी से पलायन कर रहे हैं और उन पर इतने गंभीर इल्जाम लगा रहे हैं कि इस पार्टी ने पिछड़ों, अल्पसंख्यकों, किसानों, नौजवानों और छोटे उद्यमियों की कोई खैर खबर नहीं ली और इनकी उपेक्षा हुई है, इसलिये वे अब अखिलेश यादव के दरवाजे पर हैं। ऐसे में क्या अखिलेश को MY (Muslims-Yadavs) समीकरण से आगे अब पिछड़ों का नेता भी मान लिया जाना चाहिये?

क्या अखिलेश को अब पिछड़ों का नेता भी मान लिया जाना चाहिये?

वरिष्ठ संवाददाता रामदत्त त्रिपाठी ने कहा कि बीजेपी की ओर से स्वामी प्रसाद मौर्य पर यह आरोप लगाना कि वे अपने बेटे के लिये टिकट मांग रहे थे और उन्हें लग रहा था कि उनका भी टिकट इस बार कटने वाला है, वगैरह… तो ऐसा लगता नहीं है। क्योंकि अगर ऐसा होता तो एक दो या कुछ नेता बीजेपी छोड़कर मौर्य के साथ सपा को ज्वाइन करते। ऐसा महसूस होता है जैसे कि इन नेताओं का अपने अपने समाज की ओर से भी कुछ प्रेशर था। देखा जाय तो ये नेता मगरूर नहीं हैं, ये ऐसे नेता नहीं हैं जिन्हें आम लोगों से लेना देना नहीं हो। कहीं न कहीं इन्हें समाज की ओर से प्रेशर है।

बीजेपी लंबे समय से पिछड़े वर्ग को लुभाने की पॉलिसी पर चलने की कोशिश कर रही थी। खुद मोदी जी को बतौर पीएम सत्ता देने के पीछे भी कुछ ऐसे ही कारण थे। पार्टी को लगता था कि मोदी जी के पीएम बनने से पिछड़े वर्ग भी हमारे साथ रहेंगे क्योंकि मोदी खुद भी पिछड़े वर्ग से आते हैं। निम्न व पिछड़े वर्ग के लोगों को भरोसा था कि मोदी जी के नेतृत्व में यूपी में सरकार बनी तो उनका कुछ न कुछ भला तो जरूर होगा लेकिन ऐसा कुछ हो नहीं पाया। योगी जी को मुख्यमंत्री बनाने के बाद इन लोगों को लगने लगा कि अपने लोगों के मंत्री पद पर बैठे होने के बाद भी किसी भी जिले और थाने में उनकी कोई सुनवाई नहीं हो पा रही। यही नाराजगी है कि पिछड़ों का बीजेपी से मोहभंग हो गया है। ऐसे में उनके नेताओं का बीजेपी छोड़ना तो तय ही माना जायेगा।

इतने सारे नेताओं के बीजेपी को छोड़कर जाने के पीछे की वजह आखिर है क्या?

वरिष्ठ संवाददाता बृजेश शुक्ला कहते हैं, 35 साल से चुनाव कवर करते हुये हमने अक्सर देखा है कि चुनावों से पहले ऐसा होता है, लेकिन इस बार बात कुछ अलग है। 2017 के चुनाव में बीजेपी जिस पूरी टीम को बसपा से अपने खेमे में ले आई थी, आज वो पूरी टीम सपा की ओर जा रही है। उनका कहना है कि पांच सालों में योगी ने तो उनकी बात सुनी नहीं और केंद्रीय नेतृत्व ने भी उनकी कोई बात नहीं सुनी। उनके पार्टी के विधायकों ने विधानसभा में भी शोरगुल हुआ था और नेताओं ने बगावत की थी। इसके अलावा हमें इसे यूपी की राजनीति में एक नये प्रयोग के रूप में भी देखना चाहिये। 2014 से पहले दलित और पिछड़ा समुदाय सपा और बसपा के बीच बंटा हुआ था, लेकिन 2014 में मोदी के भारतीय राजनीति में उदय और यूपी आने के बाद यह साफ हो गया कि चुनाव में अति पिछड़ा वर्ग और दलित समुदाय को साथ लिये बगैर चुनाव जीतना अब आसान नहीं होगा।

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